मोटर बाईक से नान्देड से लेह-लद्धाख यात्रा, सुनने में ही बेहद कठिन लगने वाला शब्द वास्तव में सपने से हकीकत में साकार हो गया। लेह यात्रा एक सपने के समान है वो भी बाइक पर घूम कर आना, जब हम दो बन्दे एक बाइक पर नान्देड से लेह तक घूम कर आये। नान्देड से लेह तक जाने वाले एक साल में एक आध से ज्यादा सनकी (लोग) सिरफ़िरे नहीं होते। नान्देड से लेह-लद्धाख की दूरी वाया मनाली लगभग 2450 किलोमीटर है। नान्देड से लेह की दूरी वाया श्रीनगर लगभग 2925 किलोमीटर है। हमने दोनों मार्गो का प्रयोग किया।
बचपन से लम्बी दूरी की बाईक सवारी की बड़ी इच्छा थी। मैं पहले भी बद्रीनाथ-केदारनाथ बाईक पर जा चुका हूँ। दो बार दक्षिण भारत की यात्रा पर जा चुका हूँ। दक्षिण भारत की यात्रा फिर कभी होगी अभी तो सिर्फ लेह-लद्दाख यात्रा के बारे में विस्तार से पढ़िए। इस यात्रा में हमारे साथ दिल्ली में रहने वाले दोस्त संदीप पवाँर साथ जाने वाले थे, हम दिल्ली में उनके घर पर ही गये थे।
3 जुलाई 2010 का दिन तय हुआ। हम अपनी बाईक महाराष्ट्र के नांदेड के पास एक गाँव है, कुरून्दा जिसका ताल्लुका है बसमत, यहाँ से लेकर चले थे, जो की और दिल्ली से दूरी है 1524 किलोमीटर के आसपास वाया इंदोर से। कुरून्दा से मैं संतोष तिडके अपने एक दोस्त गजानंद के साथ तय समय से दो दिन पहले ही एक जुलाई को लोनी-बोर्डर दिल्ली पहुँच गए थे। मेरे साथ आया मेरा दोस्त गजानन्द उर्फ़ ढिल्लू तो भरतपुर सिटी से वापस भाग जाने की बात कह रहा था। बडी मुश्किल से उसे मैं दिल्ली तक ले कर आया था। हम दोनों ने 1524 की दूरी केवल दो दिन में तय की। पहली रात हमने इन्दौर के पास बितायी थी, दूसरी दिल्ली में बितायी, और रात के एक बजे हम दिल्ली पहुँच गये थे। अगले दिन दिल्ली में घूमे थे।
ये फ़ोटो चंडीगढ में घुसने से पहले का है।बचपन से लम्बी दूरी की बाईक सवारी की बड़ी इच्छा थी। मैं पहले भी बद्रीनाथ-केदारनाथ बाईक पर जा चुका हूँ। दो बार दक्षिण भारत की यात्रा पर जा चुका हूँ। दक्षिण भारत की यात्रा फिर कभी होगी अभी तो सिर्फ लेह-लद्दाख यात्रा के बारे में विस्तार से पढ़िए। इस यात्रा में हमारे साथ दिल्ली में रहने वाले दोस्त संदीप पवाँर साथ जाने वाले थे, हम दिल्ली में उनके घर पर ही गये थे।
3 जुलाई 2010 का दिन तय हुआ। हम अपनी बाईक महाराष्ट्र के नांदेड के पास एक गाँव है, कुरून्दा जिसका ताल्लुका है बसमत, यहाँ से लेकर चले थे, जो की और दिल्ली से दूरी है 1524 किलोमीटर के आसपास वाया इंदोर से। कुरून्दा से मैं संतोष तिडके अपने एक दोस्त गजानंद के साथ तय समय से दो दिन पहले ही एक जुलाई को लोनी-बोर्डर दिल्ली पहुँच गए थे। मेरे साथ आया मेरा दोस्त गजानन्द उर्फ़ ढिल्लू तो भरतपुर सिटी से वापस भाग जाने की बात कह रहा था। बडी मुश्किल से उसे मैं दिल्ली तक ले कर आया था। हम दोनों ने 1524 की दूरी केवल दो दिन में तय की। पहली रात हमने इन्दौर के पास बितायी थी, दूसरी दिल्ली में बितायी, और रात के एक बजे हम दिल्ली पहुँच गये थे। अगले दिन दिल्ली में घूमे थे।
ये फ़ोटो चंडीगढ में घुसने से पहले का है।
दो जुलाई को तीनो बाईक के छ: बन्दे, एक साथ मिले और यात्रा की तैयारी पूरी की। हमारे गाँव से ही दो और दोस्त बाबूराव और कैलाश देशमुख का भी फ़ोन आया कि हम भी कल सुबह चल देंगे और आपको अमरनाथ में मिलेंगे। 3 जुलाई को सब सुबह 4 बजे, तय स्थान पर लोनी-बोर्डर दिल्ली बस डिपो के सामने आ पहुंचे। हमारी सवारी रोशनी होने तक दिल्ली को पीछे छोड़ चुकी थी। पानीपत, करनाल होते हुए सुबह के सवा आठ बजे हम अम्बाला के फ़्लाईओवर पर डेरा जमा चुके थे। कुछ देर आराम कर आगे का रास्ता पकड़ना शुरु किया। यही कही पर सबने सु-सु-सासु भी किया जो की बड़ी जोर से लगा था।
चंडीगढ़ तक पहुंचते ही जोरदार बारिश ने हमारा स्वागत किया। अपनी-अपनी बाईक किनारे लगा, हम लोग, अजी! हम लोग क्या सड़क पर चलने वाले सब के सब लोग जिसे जहाँ जगह मिली, वो वहां घुस गया। पानी भी झमा-झम जो बरसा था बारिश ने हमारा एक घंटा जरुर बर्बाद किया। बारिश से कुछ भीगते, कुछ बचते-बचाते हुए, हम छ बन्दे चंडीगढ की बडी-बडी सडको पर बिल्कुल राज्य-मार्गों की तरह तेजी से बाइक दौडाते हुए रोपड पहुँचे। यहाँ सबने दोपहर का खाना खाया। आगे बढते हुए बिलासपुर जा पहुंचे। रास्ते में चाय पीने वाले बन्दों ने चाय पी, जिस दुकान पर हमने चाय पी थी, ठीक उसी जगह बाये हाथ से एक मार्ग नैना देवी मंदिर की ओर जाता है, तथा यहां से दूरी है, मात्र 16 किलोमीट ही है, लेकिन नैना देवी को यही से नमस्कार कर लिया तथा फिर कभी आने की बोल कर हम नैना देवी मंदिर की ओर ना जा कर सीधे सुंदरनगर पहुंचे, यहां पर नदी का पानी रोक बांध बनाकर एक झील बनाई हुई है, जिससे बिजली बनाई जाती है, हम यहां रुके फोटो खीचें व आगे बढते हुए मंडी शहर जा पहुंचे।
ये फ़ोटो पहाड में घुसते ही लिया था।चंडीगढ़ तक पहुंचते ही जोरदार बारिश ने हमारा स्वागत किया। अपनी-अपनी बाईक किनारे लगा, हम लोग, अजी! हम लोग क्या सड़क पर चलने वाले सब के सब लोग जिसे जहाँ जगह मिली, वो वहां घुस गया। पानी भी झमा-झम जो बरसा था बारिश ने हमारा एक घंटा जरुर बर्बाद किया। बारिश से कुछ भीगते, कुछ बचते-बचाते हुए, हम छ बन्दे चंडीगढ की बडी-बडी सडको पर बिल्कुल राज्य-मार्गों की तरह तेजी से बाइक दौडाते हुए रोपड पहुँचे। यहाँ सबने दोपहर का खाना खाया। आगे बढते हुए बिलासपुर जा पहुंचे। रास्ते में चाय पीने वाले बन्दों ने चाय पी, जिस दुकान पर हमने चाय पी थी, ठीक उसी जगह बाये हाथ से एक मार्ग नैना देवी मंदिर की ओर जाता है, तथा यहां से दूरी है, मात्र 16 किलोमीट ही है, लेकिन नैना देवी को यही से नमस्कार कर लिया तथा फिर कभी आने की बोल कर हम नैना देवी मंदिर की ओर ना जा कर सीधे सुंदरनगर पहुंचे, यहां पर नदी का पानी रोक बांध बनाकर एक झील बनाई हुई है, जिससे बिजली बनाई जाती है, हम यहां रुके फोटो खीचें व आगे बढते हुए मंडी शहर जा पहुंचे।
मंडी पार करने पर एक रास्ता नदी का पुल बाये हाथ की ओर से पार करने पर पठानकोट की ओर जाता है। पठानकोट यहां से कुल 208 किलोमीटर की दूरी पर है। चंडीगढ से मंडी की दूरी 200 किलोमीटर की है। मंडी पार करने पर 15 किलोमीटर दूर पण्डोह नामक जगह आती है। यहां भी एक बांध है, जिसका नजारा बडा सुंदर है। बांध का नजारा देखने के बाद आगे बढे, 5-6 किलोमीटर आगे हणोगी माता का मंदिर आता है। हणोगी माता के मंदिर में रात में रुकने का अच्छा प्रबंध है, कमरा 150 में हाल में 20 रु का खर्च आता है। हम यहां 4 बजे पहुंच गये थे, इसलिए हमने माता को प्रणाम किया व आगे बढ गये।
हणोगी माता मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर के बाद एक सुरंग आती है, जो कि 2750 मीटर लम्बाई की है। सुरंग पार कर आगे एक रास्ता कुल्लू व एक रास्ता मणिकर्ण की ओर जाता है। मणिकर्ण हमे जाना नहीं था इसलिये हम कुल्लू होते हुए मनाली जाने वाले रास्ते पर चल दिए। कुल्लू से मनाली जाने के लिए नदी के दोनों तरफ रास्ते है, सीधे हाथ वाले रास्ते के नज़ारे बहुत खुबसूरत है, इसलिए हम सीधे हाथ वाले मार्ग से नज़ारे देखते हुए गये। मनाली से पहले एक धनुष आकार का पुल बड़ा शानदार है। शाम सात बजे मनाली जा पहुंचे, अँधेरा होने वाला था। यही पर रात्रि विश्राम किया गया। हम मनाली में सरकारी आवास में रुके, जिसका डोरमेट्री किराया एक बेड का टैक्स सहित 110 रु था। ये हमारा पहला दिन था। सब काफी थके हुए थे, पूरे 525 किलोमीटर की छोटी सी यात्रा ही तो की थी।
ये रहे जाट देवताहणोगी माता मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर के बाद एक सुरंग आती है, जो कि 2750 मीटर लम्बाई की है। सुरंग पार कर आगे एक रास्ता कुल्लू व एक रास्ता मणिकर्ण की ओर जाता है। मणिकर्ण हमे जाना नहीं था इसलिये हम कुल्लू होते हुए मनाली जाने वाले रास्ते पर चल दिए। कुल्लू से मनाली जाने के लिए नदी के दोनों तरफ रास्ते है, सीधे हाथ वाले रास्ते के नज़ारे बहुत खुबसूरत है, इसलिए हम सीधे हाथ वाले मार्ग से नज़ारे देखते हुए गये। मनाली से पहले एक धनुष आकार का पुल बड़ा शानदार है। शाम सात बजे मनाली जा पहुंचे, अँधेरा होने वाला था। यही पर रात्रि विश्राम किया गया। हम मनाली में सरकारी आवास में रुके, जिसका डोरमेट्री किराया एक बेड का टैक्स सहित 110 रु था। ये हमारा पहला दिन था। सब काफी थके हुए थे, पूरे 525 किलोमीटर की छोटी सी यात्रा ही तो की थी।
ये रहे पण्डोह बाँध
ये है हणोगी माता का मन्दिर
ये है हणोगी माता मन्दिर से आगे सुरंग के अन्दर का फ़ोटो
नजदीक ही एक होटल में खाना खा कर जब वापस आ रहे थे, तो किसी ने कोई महिला छेड़ दी, लेकिन ज्यादा भीड़ होने के कारण बंदा झगडे से बच गया। महिला को समझाया, क़ि इसने जानबूझ नहीं छेड़ा है यहाँ रास्ता ही तंग है बिना एक दूसरे से अड़े हुए नहीं निकला जा सकता है। किसी तरह वो महिला मानी और तब जाकर सब वहाँ से अपने कमरे में सोने के लिये चल पडे। कमरे पर आकर सबने कहा क़ि हममे से कोई भी ऐसी जगह नहीं जायेंगे जहाँ पर ज्यादा भीड हो। रात में 10 बजे तक सब सो गये। सुबह 5 बजे जो उठना था।
नजदीक ही एक होटल में खाना खा कर जब वापस आ रहे थे, तो किसी ने कोई महिला छेड़ दी, लेकिन ज्यादा भीड़ होने के कारण बंदा झगडे से बच गया। महिला को समझाया, क़ि इसने जानबूझ नहीं छेड़ा है यहाँ रास्ता ही तंग है बिना एक दूसरे से अड़े हुए नहीं निकला जा सकता है। किसी तरह वो महिला मानी और तब जाकर सब वहाँ से अपने कमरे में सोने के लिये चल पडे। कमरे पर आकर सबने कहा क़ि हममे से कोई भी ऐसी जगह नहीं जायेंगे जहाँ पर ज्यादा भीड हो। रात में 10 बजे तक सब सो गये। सुबह 5 बजे जो उठना था।
मनाली के पास धनुष आकार के पुल पर
मनाली के पास धनुष आकार के पुल पर
मनाली में मन्दिर का
अगले लेख में रोहतांग दर्रा व आगे बारालाचा की बर्फबारी में फंसने के बारे में बताया जायेगा।












